बैषाख की षुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते है ।पुराणों में ‘त्रेता युग ’ का आरम्भ भी इसी दिन से बताया गया है । इसलिए इसे ‘युगादि’संज्ञक तिथि भी माना जाता है । इसमें दोपहर से पहले जो तिथि हो ,उसे ग्रहण करना चाहिए । जो मनुश्य बैषाख षुक्ल तृतीया को पराह्-व्यापिनी लेते है ,उसके हव्य को देवता और कव्य को पित्तर ग्रहण नहीं करते । यह दिन बड़ा ही पवित्र होता है ।
‘‘पूवहि तु सदा कार्याः षुक्लामानुयुगादयः । दैवे कर्माणि पैत्रये च कृश्णे चैवाअपराह्कि । ।’’
बैषाख षुक्ल पक्ष की तृतीया को किया गया अन्न-जलदान, स्नान,होम,जप-तप आदि का फल अनन्त होता है । इसकी महिमा बताते हुए कहा है । -इस दिन किउ हुए दान, जपादि सभी ‘अक्षय’होते है। इसी से इसका नाम ‘अक्षय -तृतीया’पड़ा है । भविश्य पुराण में लिखा है-
‘‘यत्कित्रिचदीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु । तत्सर्वमक्षयं यस्मात्तेनेयमक्षया स्मृता । । ’’
जेा मनुश्य षास्त्रानुसार आज के दिन लड्डू, भुने हुए जौ जिसमें बूरा या कुछ मीठा मिला हो का आटा ,पंखा या पंखी ,मटका आदि दान करता है ,उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है । इस समय तक आधा बैषाख बीत चुका होता है । इसलिए गर्मी अपने चरम पर रहती है और इस प्रचंड गर्मी में राह चलते पथिकों के लिए छाया-स्थल और ठण्डे पानी की प्याऊ लगवाना भी अति उत्तम है । यह पर्व हमको ऋतु-त्याग व परोपकार का पाठ पढ़ाता है। इस संदर्भ में एक कथा भी मिलती है । एक समय राजा युधिश्ठिर ने भगवान कृश्ण से पूछा -‘हे भगवान !कृपा कर आप ‘अक्षय तृतीया’का माहात्म्य -वर्णन कीजिए । कृश्ण भगवान ने कहा-‘पूर्वकाल में अत्यन्त निर्धन और सत्यावादी एक श्रद्धालु वैष्य था । वह अधिक परिवार वाला होने के कारण सदैव व्याकुल रहता था । उसने बैषाख षुक्ल ‘अक्षय तृतीय ’के व्रत के माहात्म्य को सुना । इस व्रत में दान, जप, हवन और स्नान का महत्फल होता है । ’ इस बात को सुनकर वह वैष्य गंगाजी के किनारे गया और वहां जाकर उसने पित्तर और देवों का पूजन किया । घर जाकर उसने सत्तू, दही,पंखी और मिश्ठान ब्राह्यणों को दान में दिए । पत्नी के मना करने पर भी वह अपने धर्म से विमुख नहीं हुआ । इससे राजन्! स्मय पाकर उस वैष्य का जन्म दूसरी यौनि में एक क्षत्रिय के घर हुआ । अपने पहले दान के प्रभाव से वह बड़ा धनाढ्य हो गया ,किन्तु इतना अधिक धन प्राप्त करने पर भी उसकी बुद्धि धर्म से विचलित नहीं हुई ,प्रत्युत वह और अधिक धार्मिक हो गया । यह सब ‘ अक्षय तृतीय ’का ही पुण्य प्रभाव था । भारत में यह व्रत -धार्मिक दृश्टि से ही किया जाता है । इस कारण यह व्रत तथा पर्व अन्य पर्वों व व्रत की तहर धूमधाम से नहीं मनाया जाता है । मन्दिरों में इस दिन भोग में सत्तू रखा जाता है । इसी दिन से भगवान को सफेद वस्त्र धारण कराए जाते है । इस दिन से धर्मात्सा लोगों की ओर से निर्जन मार्गों में प्याऊ लगाई जाती है । इसी दिन से ही हवन करना , जौ से ही भगवान विश्णु का पूजन करना और ब्राह्यणों के लिए जल से पूरित घड़ा ,पंखा ,जौ और चना का सत्तू व दही और चावल आदि का दान किया जाता है । इसके अतिरिक्त इस दिन रात्रि के प्रथम प्रहर में परषुराम जी का जन्म हुआ था । इसलिए इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है ।इस दिन प्रायः स्नान के अनन्तर संकल्प करके सूर्यास्त तक मौन रखें और सायंकाल भगवान परषुराम जी का पूजन करें ।
PRAVEEN CHOPRA